वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, केंद्र ने किया याचिका का समर्थन

सत्य पथिक वेबपोर्टल/नई दिल्ली/SC tough on ‘bee culture’: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को मुफ्त दी जाने वाली बिजली-पानी और अन्य सुविधाओं यानी रेवड़ी कल्चर (bee culture) को खत्म कराने को लेकर एक बार फिर सख्ती दिखाई है। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि यह एक गम्भीर मुद्दा है। चुनाव आयोग और सरकार इससे पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार और चुनाव आयोग इस पर रोक लगाने के लिए आपस में तालमेल बनाकर पहल करें। बता दें कि देश भर में चुनाव से पहले लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां जनता को अपने पाले में करने के लिए मुफ्त सामान और सेवाएं बांटने के लोकलुभावन ऐलान करती हैं। इसे ही आम भाषा में ‘रेवड़ी या बी कल्चर’ कहा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस ‘फ्री बी’ यानी ‘रेवड़ी कल्चर से निपटने के लिए एक विशेषज्ञ निकाय बनाने की वकालत की है। सुप्रीम कोर्ट ने इस निकाय में केंद्र, विपक्षी राजनीतिक दलों, चुनाव आयोग, नीति आयोग, आरबीआई और अन्य हितधारकों को शामिल करने का भी सुझाव दिया है। कहा है कि इस निकाय में फ्री बी पाने वाले और इसका विरोध करने वाले भी शामिल हों। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि यह मुद्दा सीधे देश की इकानॉमी पर असर डालने वाला है। लिहाजा एक हफ्ते के भीतर ऐसे विशेषज्ञ निकाय के गठन के लिए प्रस्ताव आमंत्रित करने को कहा गया है। अब इस जनहित याचिका पर 11 अगस्त को अगली सुनवाई होगी।

इससे पहले याचिकाकर्ता के वकील विकास सिंह ने अदालत को बताया कि मुफ्त रेवड़ी कल्चर कैसे देश-राज्य की आर्थिक सेहत पर असर डालने के साथ ही और जनता की कमर पर भी भारी बोझ बढ़ाता है। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इससे वोटर की अपनी राय डगमगाती है। ऐसी प्रवृत्ति से हम आर्थिक विनाश की ओर बढ़ रहे हैं।
चुनावों में मुफ्त की घोषणा वाले वादे के खिलाफ वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। केंद्र सरकार के वकील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सैद्धांतिक तौर पर हम इस याचिका का समर्थन करते हैं। फ्री देना अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है। बता दें कि इस साल जनवरी में भी प्रधान न्यायाधीश एनवी रमन्ना और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति हेमा कोहली की पीठ ने केंद्र और चुनाव आयोग दोनों से इस मामले को लेकर जवाब मांगा था।

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