डॉ. राजेश शर्मा

(प्रसिद्ध रंगकर्मी, पत्रकार एवं साहित्यकार)



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💐भारत में राम करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र हैं। वह वैसे ही भगवान हैं अपने हिंदुओं के जैसे कि मुसलमानों के अपने अल्लाह हैं। लेकिन हिंदुओं और मुसलमानों के बीच यह लड़ाई लंबे समय से होती आ रही है कि राम और अल्लाह के वजूद को ना नकारने के बावजूद भी लोग आपस में लड़ रहे हैं। कारण क्या हैं? दो अलग धर्म? या फिर दोनों के पूजा-पाठ, इबादत के अलग तरीके? धर्म के ठेकेदार यह गुंजाइश ही नहीं छोड़ रहे हैं कि दोनों धर्मों के लोग एक- दूसरे से गंगा-जमुनी तहजीब का पाक रिश्ता रख सकें। गंगा-जमुनी तहजीब के रिश्ते की बात तो हर मंच पर होती है, हर सियासत में होती है, हर तरीके से होती है लेकिन इन दोनों धर्मों के ठेकेदार इस रिश्ते को बचाना ही नहीं चाहते। क्योंकि उनकी जीत सिर्फ लड़ाई में है। वह एक दूसरे के धर्मों के कद काटकर अपने कद को बढ़ाना चाहते हैं। और यही कुछ हुआ है कलाकार दानिश के साथ।


दानिश पिछले कई सालों से बरेली की रामलीला में भगवान राम का रोल करता रहा है और बड़ी शिद्दत, किरदार में पूरी तरह डूबकर जीवंत अभिनय करता है। मैंने स्वयं दानिश का साक्षात्कार किया है। मैंने दानिश से यह प्रश्न किया कि मुसलमान होने के बावजूद तुम इतनी शिद्दत से हिंदुओं के पूज्य भगवान राम के रोल को कैसे निभा ले जाते हो? दानिश का जवाब था- “किरदार निभाते वक्त मैं न तो मुसलमान होता हूं ना ही मेरा नाम दानिश होता है। मैं उस वक्त राम के किरदार को जी रहा होता हूं।”


मैंने उससे प्रश्न किया कि जब राम दरबार सजता है, तुम्हारी आरती होती है, लोग तुम्हारे चरणों में गिरे हुए होते हैं,शहर की एक से एक बड़ी हस्ती तुम्हें नतमस्तक होकर देख रही होती है, तब तुम्हें कैसा लगता है। उसने जवाब दिया- “मुझे तो कुछ भी नहीं दिखता। मुझे लोग भी नहीं दिखते। मैं उस वक्त संज्ञा शून्य होता हूं। मैं उस समय राम होता हूं।” मैंने उससे पूछा कि अपने किरदार में यानी कि राम के किरदार में तुम इतने शक्तिशाली तरीके से कैसे अंदर घुस जाते हो? इस सवाल पर उसने बताया- “मैं राम के चरित्र को समझकर अपने आपको सात्विक रखने की कोशिश करता हूं। मैं 40 दिन तक मांसाहार नहीं करता। इन दिनों मैं लगभग उपवास पर रहता हूं। मेरे घर में ही राम और सीता के वह जेवर और कपड़े बनते हैं जिन्हें हम लोग रामलीला में इस्तेमाल करते हैं।”


ये सब बातें दानिश ने मुझे बताईं लेकिन मैं दानिश को इतने सालों से जानता हूं। दानिश ने कभी भी हिंदू होने का प्रमाण नहीं दिया। दानिश ने कभी यह नहीं कहा कि वह दानिश खान नहीं है। वह नमाज भी पढ़ता है। वह अपने धर्म का कायल भी है। वह सिर्फ एक कलाकार के तौर पर एक चरित्र निभाता है राम का। तो क्या अब कलाकारों को भी वह करना पड़ेगा जो सियासत उनसे करवाना चाहेगी?


ईश्वर हो या अल्लाह, हम सब उसकी बनाई दुनिया में रहते हैं। हम सब उसकी बनाई बताई बातों पर चलते हैं। हम सब अपने-अपने धर्मों को अपने हिसाब से निभाते हैं। अब हमें यह कौन बताएगा कि हम अपनी जिंदगी में किस तरह के फैसले लें या नहीं लें?क्या एक सनातनी हिंदू को इस बात से खतरा है कि एक मुसलमान उनके भगवान के रोल में बहुत अच्छा लगता है, बहुत सशक्त अभिनय करता है, और लोग यानी कि हिंदू लोग नतमस्तक हो जाते हैं। उन सबको मालूम होना चाहिए कि लोग नतमस्तक अपने भगवान राम के सामने होते हैं। दानिश खान के सामने नहीं और दानिश खान उस समय दानिश खान ना होकर, एक मुसलमान ना होकर, भगवान राम का स्वरूप होता है।


नफ़रत का यह बीज दानिश के एक किराये के विवादित शख्स ने बोया है जो खुद मुस्लिम है। उसे दानिश का राम बनना पसंद नहीं या वो इसको सियासत का मुद्दा बनाना चाहता है। इसकी पड़ताल होनी चाहिए और नफ़रत का बीज बोने वालों को बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए। साहित्य, कला, कविता और रंगकर्म कट्टरता और कठमुल्लापन से बहुत ऊपर हैं। यह सब मानवता का संदेश देती है। भाईचारे और सामंजस्यता का रास्ता खोलती है। हमें मिलकर इसकी परवाह करनी चाहिए।

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