कई जुगाड़ू पत्रकारों ने पिछली सरकारों में रियायती दरों पर भूखंड खरीदे और आलीशान भवन बनवाकर ऊंचे किराए पर मकान उठा रखे हैं, नवीनीकरण को कोई पूछता ही नहीं है

सिस्टम में झोल की परतें उधेड़ती राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अजय वर्मा की इनसाइड स्टोरी

Satyapathik.com/लखनऊ/Inside Story: उत्तर प्रदेश राज्य संपत्ति विभाग द्वारा नियमित लिखने वाले राजधानी लखनऊ के 43 नामचीन श्रमजीवी पत्रकारों के सरकारी आवासों का वित्तीय वर्ष 2022-23 में नवीनीकरण नहीं किया गया है। इन सभी पत्रकारों को अपने आवंटित सरकारी आवास सम्भवतः बहुत जल्द खाली करने पड़ सकते है। योगी सरकार कहने को तो पत्रकार हितों की कई योजनाओं पर काम कर रही है परंतु कोई भी योजना पत्रकारों के गुटों के निहित स्वार्थों की ही वजह से परवान नहीं चढ़ पा रही है। मुख्यमंत्री जन आरोग्य अभियान के अंतर्गत राज्य एवं जिला स्तर पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों और उनके परिवारों के सदस्यों को चिकित्सा सुविधा लाभ दिलवाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी मिली थी, लेकिन वह योजना भी आगे नही बढ़ सकी और गुटबाजी की भेंट चढ़ गई। नतीजा यह है कि आज तक कम ही पत्रकारों को आयुष्मान कार्ड मिल पाए हैं।

प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पत्रकारों की आवास से संबंधित बड़ी समस्या के समाधान के वास्ते योगी सरकार द्वारा नि:शुल्क जमीन भी चिन्हित की गई थी, लेकिन एक बार फिर गुटबाज़ी के चलते पत्रकारों की आवास की समस्या का कोई समाधान नहीं निकला सका। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अगस्त 2016 में विधानसभा में राज्य संपत्ति विभाग के नियंत्रण वाले भवनों को पत्रकारों, राज्य कर्मचारियों, अधिकारियों, कर्मचारी संघों, राजनीतिक दलों और अन्य पात्र लोगों को आवंटित किए जाने का प्राविधान किया गया था। उस वक्त पत्रकारों के एक बड़े समूह द्वारा जुगाड़ बैठाकर रियायती दरों पर बड़े भूखंड झटक लिए थे। बाद में आलीशान भवन बनवाकर महंगे किराए पर उठा रखे हैं। ये चंद जुगाड़ू पत्रकार इन सरकारी मकानों पर अपना मालिकाना हक समझकर वर्षों से काबिज हैं। अपने जुगाड़ तंत्र के चलते साल दर साल इन सरकारी मकानों को खाली करने का इनका कोई इरादा भी नहीं दिखता है।

असल में समस्या यह है कि कुछ जुगाड़ू पत्रकारों और नेताओं ने राजधानी की पाॅश काॅलोनियों में अनधिकृत रूप से अरसे से सरकारी मकानों पर कब्जा कर रखा है। लिहाजा वास्तविक जरूरतमंद पत्रकारों को सरकारी आवास आवंटित नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे अनेक पत्रकार है जो लखनऊ शहर में आवास नहीं मिल पाने के कारण लंबे समय से विकट समस्याओं से जूझ रहे हैं। सभी जरूरी प्रक्रियाओं का अनुपालन कर नियमित रूप से सरकारी आवासों के लिए आवेदन करते भी रहे हैं परंतु जुगाड़ू पत्रकारों ने सरकारी आवास खाली नहीं करने के वास्ते राज्य संपत्ति विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर 222 पात्र पत्रकारों के आवेदन आनन-फानन में रद्द करवा दिए हैं।

सच्चाई तो यह है कि सरकारी आवास के मोह में अनेक वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा राज्य संपत्ति विभाग को इस आशय के फर्जी शपथ पत्र भी दे दिए हैं कि उनका या उनके परिवार का लखनऊ शहर में कोई अन्य आवास नहीं है जबकि कई पत्रकार ऐसे हैं, जिनको लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा रियायती दरों पर गोमती नगर क्षेत्र में बहुमूल्य भूखंड आवंटित किए गए थे। इन्होंने उन भूखंडों पर बड़े-बड़े बंगले बनाकर लाखों रुपये मासिक किराये पर उठा रखे हैं। परंतु, स्वार्थ सिद्धि के लिए झूठे शपथपत्र देकर खुद को कानून की नजर में अपराधी बनाने से भी ये चौथा स्तंभ नही डगमगाता। न कानून के प्राविधानों का डर दिखता है और न ही अपने साथी पत्रकारों की जरूरतों का ख्याल रहता है। ये जुगाड़ू पत्रकार नेता तो जुगाड़ की ताकत से अपने आवास का नवीनीकरण करा लेते हैं लेकिन खबरों की दुनिया में मुख्यधारा से जुड़े अनेक ज़रूरतमंद कलम के धनी पत्रकार सरकारी आवास के आवंटन के लिए केवल अर्जी लगाते ही रह जाते हैं। जोड़तोड़ के गणित और पत्रकार संगठनो की राजनीति से कोसों वास्तविक पात्र पत्रकारों के सरकारी आवास का नवीनीकरण उत्तर प्रदेश सरकार के नौकरशाह नहीं कर रहे हैं।

पत्रकारिता जगत में राष्ट्रीय पत्रकारों के संगठन के नेता एवं कलम के धनी पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस को कौन नहीं जानता है लेकिन उनके मकान का नवीनीकरण न करके सरकार द्वारा कहीं ना कहीं धीर गंभीर पत्रकारों को डराने-धमकाने का भी प्रयास किया जा रहा है। न्यूज़ 18 के तेजतर्रार मनमोहन राय और अनामिका सिंह जिनकी खबरों की लोकप्रियता देश भर में प्रसिद्ध हैं उनके सरकारी आवास का भी नवीनीकरण नहीं किया गया है। मधुसूदन त्रिपाठी, उमाशंकर त्रिपाठी, विनय राय, देवकी नंदन मिश्रा, प्रेम कांत तिवारी, अवनीश विद्यार्थी, केवी राव, पंकज झा, प्रमोद गोस्वामी, विजय शर्मा, उपेंद्र शुक्ला, आरडी शुक्ला, शुभ आशीष मिश्रा, कामना हजेला, नरेंद्र श्रीवास्तव, आशीष कुमार सिंह, अजीत प्रताप सिंह, राजेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह, किशन सेठ, शक्तिधर यादव, मनोज भद्रा, अशोक मिश्रा, सीपी राय, हिमांशु जोशी, समेत कुल 43 वरिष्ठ पत्रकारों के सरकारी आवासों का नवीनीकरण वर्ष 2022 में नहीं हुआ है।
माननीय उच्च न्यायालय के दिनांक 01.08.2016 के आदेश के क्रम में राज्य संपत्ति विभाग द्वारा 282 पत्रकारों को आवास खाली करने का नोटिस भी जारी किया गया लेकिन ज्यादातर जुगाड़ू पत्रकारों ने आवास खाली किए नहीं हैं। सरकारी आवास आवंटन मामले की सुनवाई करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी स्पष्ट रुप से निर्देशित किया जा चुका है कि “सरकारी आावास किसी परोपकार, उदारता के रूप में नहीं दिये जाने चाहिये। सरकारी आवास अधिकार नहीं है बल्कि जिन पात्र आवेदकों के सिर पर छत नहीं है, उन्हें नियमानुसार प्राथमिकता से आवंटित किये जाने चाहिये।”

Leave a Reply

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!