== निर्भय सक्सेना ==

सत्य पथिक वेबपोर्टल/बरेली। फेसबुक, ट्विटर या इंटरनेट आजकल सोशल मीडिया से जुड़े लोगों के लिए अड्डेबाजी का सशक्त माध्यम बने हुए है। लेकिन अब से चार दशक पहले यानी वर्ष 1970 से वर्ष 2010 तक बरेली के जागरूक लोग चाय की दुकानों और चोराहों पर स्थित पान के खोखें एवम चाय के दुकानों पर जमा होकर नगर से लेकर देश भर की राजनीतिक व सामाजिक चर्चाओं पर चटकारे लेकर अपनी राय व्यक्त किया करते थे। तब इतनी राजनीतिक वैमनस्यता भी नही थी। सभी लोग अपनी बात मजबूती से तर्क सहित कहते थे। एक दूसरे के व्यक्तिगत कार्यक्रम में भी खुलेआम आते-जाते थे।
बरेली में अड्डेबाजी के लिए तब के प्रमुख चावला रेस्टोरेण्ट, चोधरी रेस्टोरेंट, कचहरी पर फौजी और बसंत की चाय की दुकान, बार एसोसिएशन वाली बगिया, सैलानी चोराहा, नावल्टी चोराहे पर रामेश्वरदास की लस्सी की दुकान, मजीद व पिल्लू की चाय की दुकान, सोबरन व सैयद की पान की दुकान, मजार के बराबर स्थित लाला की एवम कचहरी में चाय की दुकान पर रात तक जमघट लगा रहता था। उन दिनों पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी अक्सर वहां पहुंच कर पत्रकारों से चर्चा और मशबिरा किया करते थे।
बरेली में कांग्रेस के लिए स्वर्गीय रामसिंह खन्ना, लक्ष्मण दयाल सिंघल, रामेश्वरनाथ चोबे की कोठी, जगदीश शरण अग्रवाल की बैठक चर्चा के लिए अहम स्थान था। वहीं जनसंघ (वर्तमान में भाजपा) के लिए सत्यप्रकाश अग्रवाल की बैठक, संतोष गंगवार की दवा की दुकान, राजवीर सिंह की अयूब खां चोराहा स्थित वाटर इंजन की दुकान, वीरेन्द्र वर्मा का कचहरी स्थित बिस्तर, कम्युनिस्ट नेताओं के लिए नावल्टी चोराहे पर लाला की चाय की दुकान व आर्य समाज गली में रघुनंदन प्रसाद वर्मा वकील का मकान, श्रीराम अग्रवाल सर्राफ का घर व दुकान राजनीतिक चर्चाओं के लिए जाने जाते थे। विमको के सुरेश चन्द्र सक्सेना का बजरिया पूरनमल, पटवा गली निवास पर रविवार को बरेली जनपद के श्रमिक नेताओं का जमाबड़ा रहता था। जहां श्रमिक हितों के लिए श्रमिक कानूनों पर चर्चा होती थी जिसमें जे.सी. पालीवाल, रामस्वरूप शुक्ला, जे. बी. सुमन, चोधरी हरसहाय सिंह, गिरीशभारती, शंभुदत्त बेलवाल, रघुनंदन प्रसाद वर्मा, अनिल एडवोकेट , मुंशी प्रेम नारायण सक्सेना, लक्ष्मी नारायण एडवोकेट, हर सहाय सक्सेना आदि आते रहते थे और दलगत राजनीति से ऊपर कानूनी एवम अन्य मुद्दों उठकर चर्चा होती थी।
नावल्टी चोराहे पर अड्डेबाजी के लिए सभी पार्टियों के तत्कालीन नामचीन नेता राम सिंह खन्ना, सत्य प्रकाश अग्रवाल, हासानंद छाबड़िया, विजय कपूर, राधाकृष्ण महरोत्रा, वीरेन्द्र महरोत्रा उर्फ छोटे बाबू, राममूर्ति, सत्य स्वरूप, लक्ष्मण दयाल सिंघल, रामेश्वरनाथ चोबे, आछू बाबू, रेहान रजा, गिरीश भारती, सर्वराज सिंह, वीर बहादुर सक्सेना, वीरू, अनुराग दीपक, प्रो. पी.के.गुप्ता,राजीव जयपति, वीरेन डंगवाल, चोधरी नरेन्द्र सिंह, प्यारे मियां, रघुनंदन प्रसाद वर्मा, राजेंद्र कोहारवाल जैसे नेता राजनीतिक चर्चाओं के भाग लेते थे। वहीं सुभाष दद्दा, सरदार जिया, सरबर खां, प्रवीण सिंह ऐरन, घनश्याम मेहरा, अजय अग्रवाल, सुरेन्द्र अग्रवाल, घनश्याम शर्मा, मुन्ना चोबे व कौशल अग्रवाल, निर्भय सक्सेना, दिनेश पवन, गुलाम गौस, निराले मियां अन्य छात्र नेता सुरेन्द्र अग्रवाल राजनीतिक व सामाजिक चर्चाओं में भाग लेते थे। उन दिनों आजकल की तरह बरेली के नेताओं पर भले ही बड़ी गाडियां और गनर नहीं थे लेकिन उनकी सोच बड़ी थी। उन्हें शहर के लोगों से कभी खतरा या डर नहीं सताता। यह भी जरूरी नहीं था कि एक-दूसरे दल के लोग आपस में चर्चा नहीं करेंगे। दल-दल की राजनीति से ऊपर उठकर लोग मुद्दों पर चर्चा करते थे। इसी से कुछ हल भी निकाला करते थे।
कभी-कभी बहस के दौरान गरमा-गरमी हो जाती थी कि लोग एक दूसरे को चुनाव में हरवाने तक की धमकी तक दे देते थे। लेकिन वहां मौजूद अन्य नेता दोनों का गुस्सा शांत करा देते थे। कचहरी में अड्डेबाजी पर मुकदमों के उतार-चढ़ाव के अलावा अखबारों की सुर्खियों पर भी चर्चा होती थी। इसमें मुख्य रूप से मुंशी प्रेम नारायण सक्सेना एडवोकेट, नारायण प्रसाद अस्थाना अस्थाना, पीसी आजाद, राजीव शर्मा, वीरेन्द्र वर्मा, प्रो. रामप्रकाश गोयल, वंकेश बिहारी, राजीव चंद्रा, रामाबल्लभ शर्मा, गोपाल सहाय बिसरिया, जेडी बजाज, विष्णु दद्दा, श्यामनंदन गंगवार, राजेन्द्र कोहरवाल, राजन सक्सेना, भारतभूषण शील आदि चर्चा में शामिल होते थे।
रामेश्वर की लस्सी की दुकान पर भी शाम को नेताओं का जमघट लगा रहता था। यहां भी लोग अखबार की सुर्खियों व शहर की घटनाओं पर चर्चा करते थे। यहां पत्रकारों को भी अक्सर मसाला मिल जाया करता था। यही हाल कमाल मोटर्स पर भानु प्रताप सिंह के दरबार और रामसिंह खन्ना की कोठी पर भी रहता था। 1970 के दशक में अयूब खां चोराहे पर ‘सिंडीकेट बुक हाउस’ के बाहर ‘फाइव स्टार’ यानि शिव चरन के चाय के खोखे पर एकत्रित पत्रकार खबरों पर चर्चा करते थे। तब अभी एक दशक पूर्व तक यहां आने वालों में प्रमुख रूप से ज्ञान सागर वर्मा, रामगोपाल शर्मा, डा. वीरेन डंगवाल, गोपाल विनोदी, शंकरदास, अनुराग दीपक, दिनेश पवन, निर्भय सक्सेना, पूरनलाल शर्मा, भगवान स्वरूप, कन्हैया लाल बाजपेयी, शिव कुमार अग्रवाल, स्वतंत्र सक्सेना, अशोक वैश्य, सोम बिग, अनुपम मार्कण्डेय, जे.बी.सुमन, केके शर्मा, अशर्फी लाल, संजीव पालीवाल, इकवाल रिजवी, तस्लीम, विनोद कापड़ी, विशाल गुप्ता, सुधीर सक्सेना, नरेश बहादुर सक्सेना, श्याम पटेल, कौसर शम्शी, सुरेश शर्मा, राजेन्द्र पाण्डे, आशीष अग्रवाल, संजीव अरोरा, पवन सक्सेना, अनिल त्यागी, फिरासत हुसैन, गीतेश जौली, नवीन सक्सेना, जनार्दन आचार्य के अलावा अमर उजाला के अशोक अग्रवाल, अतुल माहेश्वरी आदि भी समय-समय पर शामिल होते थे।
इसके अलावा गैर पत्रकार जसबंत बब्बू, राजेन्द्र पाल आर्य, गुलाम गौस मुरादी, अनवर जावेद, निर्मल पंत, निराले मियां, जहीर अहमद, नजीम अंसारी भी यहां आकर चर्चाओं में शामिल होते थे। बाद में पत्रकारों का जमावड़ा नाॅवल्टी चौराहा स्थित यूपी जर्नलिस्ट्स एसोसियेशन, बरेली के ‘उपजा प्रेस क्लब’ पर लगता रहा। हालांकि अब वह बात नहीं दिखती। न मुद्दे दिखते हैं और न उन पर गंभीर चर्चा करने वाले लोग। खबरनवीस अब सबसे तेज होने के चक्कर में बस दौड़ रहे हैं।
विकास की गति तेज होने के साथ ही चर्चा की अड्डेबाजी और स्थान भी बदल गये। रोटरी जेसीज और लायंस क्लब, मानव सेवा क्लब के अलावा पंडित पान, प्रेम प्रकाश अग्रवाल, कौशल अग्रवाल व विजय गोयल की दुकानों के अलावा संजीव अग्रवाल का सीमेंट ऑफिस, विश्व मानव परिसर, सपा व वसपा कार्यालय के साथ ही मेयर रहे डॉ आईएस तोमर का हाउस, कुंवर सर्वराज सिंह का निवास, भारत सेवा ट्रस्ट पर दलीय राजनीतिक चर्चाओं का दौर चलने लगा है। हालांकि अड्डे बड़े हैं लेकिन चर्चा का भी स्वरूप बदल गया है।
अब मतभेद होते हैं तो अड्डे ही बदल जाते हैं, नेताओं के दल बदल जाते हैं। मामला मतभेद से मनभेद की ओर बढ़ जाता है। सब अपने रास्ते पर अलग से बढ़ जाते हैं, इस दौड़ में अगर कुछ पीछे छूट जाता है तो वह है अपनी बरेली, उसके मुद्दे और समस्याएं। इसीलिए इस महानगर में लड़कों के लिए केवल एक ही सरकारी एडेड बरेली कॉलेज है। महानगर में कोई भी सरकारी डिग्री कालेज लड़कों के लिए अभी तक नही है। गरीब गुरवों का एकमात्र आसरा है बरेली कालेज। बरेली मंडल मुख्यालय का अब तक यह हाल है। बरेली को कृषि यूनिवर्सिटी या कालेज, राजकीय मेडिकल कालेज अब तक नहीं मिल सका है। जो कल-कारखाने जिले की पहचान थे, वे सब बन्द हो चुके हैं। नए कारखाने लगवाने की योजनाएं सरकारी उदासीनता के चलते फाइलों में ही कैद होकर रह गई हैं।

उम्मीद है कि जल्दी ही वो पुराना दौर लौटेगा, जब लोग राजनीतिक दल विशेष तक ही सिमटी संकुचित सोच की दलदल से निकलकर बरेली के असल मुद्दों और सुलगते सवालों पर फिर स्वस्थ चर्चा शुरू करेंगे। इन चर्चाओं की बदौलत ही जनप्रतिनिधि और सरकार-प्रशासन में बैठे जिम्मेदार आखिक बरेली वालों का असल दर्द महसूस कर पाएंगे और जख्मों पर मरहम भी लगा पाएंगे। तभी स्मार्ट सिटी बन चुके बरेली को उसका खोया गौरव वापस मिल सकेगा और बरेली के बाशिंदों को कुतुबखाना, डेलापीर उपरिगामी पुल, कूड़ा निस्तारण सयंत्र, अतिक्रमण मुक्त चौड़ी-साफ सड़कें, अच्छी गति की दक्षिण भारत के शहरों को अच्छी, तेज गति वाली रेल सेवा, वायु सेवा की देश-प्रदेश के प्रमुख शहरों से कनेक्टविटी एवम उच्च स्तर की एम्स वाली चिकित्सा सेवा जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल सकेंगी।

“कलम बरेली की” पुस्तक से साभार

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