नई दिल्ली/health/सत्य पथिक न्यूज नेटवर्क: भारत में जोड़ों की बीमारियां Joint Diseases कैंसर, डायबिटीज और एड्स जैसी घातक बीमारियों से भी कहीं ज्यादा तेजी से लोगों को अपाहिज बना रही हैं। ऐसा हो रहा है जोड़ों की बीमारियों का सही इलाज नहीं मिल पाने की वजह से।

डॉ. कार्ल किर्श्चमायर जर्मनी के जाने-माने चिकित्सा वैज्ञानिक और जोड़ों की बीमारियों के विशेषज्ञ हैं। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि ‘भारत में जोड़ों की बीमारियों का इलाज पुरानी और बेअसर दवाओं से किया जाता है जिन्हें जिंदगी भर लेने की जरूरत होती है। वहीं यूरोप में जोड़ो का इलाज आम सर्दी जितना आसान हो गया है।

पिछले साल कार्ल किर्श्चमायर भारत आए थे। उन्होंने जो भी यहां देखा उससे वे आश्चर्यचकित रह गए। कार्ल किर्श्चमायर मानते हैं कि भारत में रूमेटोलॉजी साइंस पिछली शताब्दी के स्तर पर ही अटकी हुई है। बताते हैं कि यहां स्वास्थ्य सेवाएं यूरोप से 30 साल पीछे चल रही हैं। कम से कम जब बात जोड़ों और मस्क्यूलोस्केलेटल सिस्टम की बीमारियों के इलाज की आती है, तो यही लगता है। भारत में रूमेटोलॉजी एक विज्ञान के रूप में अस्तित्व में ही नहीं है।

बकौल किर्श्चमायर, भारतीय डॉक्टर जोड़ों की बीमारियों के इलाज के लिए आम तौर पर Viprosal, Dolgit, Voltaren/Fastum जैल, Diclofenac, Teraflex, Nurofen और इसी तरह की दूसरी दवाएं लिखते हैं। लेकिन इन दवाओं से जोड़ और कार्टिलेज ठीक नहीं होते, सिर्फ दर्द, सूजन आदि बस कम होते हैं। जब हम केवल दर्द को दबाते हैं तो खराब हो रहे जोड़ों पर और भी लोड पड़ता है। यह 3 से 5 गुना ज्यादा तेजी से खराब होने लगते हैं। रोगी पूरी तरह से अपाहिज भी हो सकता है।

यूरोप में जोड़ों के दर्द के इलाज का यह तरीका 20 साल पहले ही बंद हो चुका है। वहाँ पेनकिलर केवल तभी दी जाती है जब बहुत इमरजेंसी हो और इन्हें भी बहुत सावधानी से सीमित मात्रा में। जर्मनी में तो इन्हें केवल डॉक्टर के पर्चे पर कड़े कंट्रोल में ही खरीदा जा सकता है। तथाकथित ‘कोंड्रोप्रोटेक्टर’ तो पूरी तरह प्रतिबंधित है क्योंकि यह बेकार की दवाएं हैं और इन पर पैसे खर्च करना बेवकूफी ही है। जोड़ों की समस्याओं का मुख्य कारण होता है-रक्त प्रवाह में गड़बड़ियों और सिनोवियल फ्लूइड के प्रवाह में विकारों के कारण ओर्थो-साल्ट्स का जमा हो जाना। यूरेट या यूरिक एसिड के ट्रू साल्ट, जो वात की जड़ होते हैं।

ओस्टियोफ़ाइट्स या कैल्साइन साल्ट्स से ही जोड़ों और रीढ़ की हड्डियों की 97% बीमारियां होती हैं। यह बीमारियां हैं, सभी प्रकार के आर्थराइटिस और ओस्टियोआर्थराइटिस, डीडीडी, ऑस्टियोपोरोसिस, रूमेटिज्म, बार्सिटिस और यहां तक कि हाइड्रोमा भी। इन सभी बीमारियों की एक ही जड़ होती है – ओस्टियोफाइट्स का जमा हो जाना।

खतरनाक भ्रांति है कि कैल्शियम जोड़ों के लिए अच्छा होता है। जी हां, कैल्शियम अच्छा होता है लेकिन केवल तब, जब आपके जोड़ स्वस्थ हों। कैल्शियम हड्डियों के ऊतकों को मजबूती तो देता है लेकिन ओस्टियोफाइट भी लाता है जिससे उनकी बढ़वार और तेज हो जाती है।
इसलिए जर्मन रूमेटोलॉजिस्ट सबसे पहले खराब हो रहे जोड़ में रक्त प्रवाह वापस लाते हैं जिससे कई सालों से जमा हो रहे ओर्थों-साल्ट बाहर निकलें।

डा. किर्श्चमायर बताते हैं कि भारत में अपाहिज होने का सबसे बड़ा कारण न तो कैंसर है न एड्स और न डायबिटीज है, बल्कि यह ओस्टियो आर्थराइटिस है! जर्मनी में तो ओस्टियोआर्थराइटिस का इलाज चार से छह हफ्तों में ही बिना महंगी दवाओं के कर दिया जाता है वही भारत में यह पेशेंट को अपाहिज करके ही छोड़ता है।

आज जर्मनी में बड़े एक्सीडेंट को छोड़ दें तो जोड़ों की बीमारियों को खतरनाक नहीं माना जाता। 4 से 6 हफ्ते के जोड़ों की सफाई के कोर्स से वे अपनी सामान्य अवस्था में वापस आ सकते हैं और समस्याएं अगले दशक तक तो नहीं होतीं। जॉइंट कैल्सीनोसिस-यानि
वात, आर्थराइटिस, ओस्टियो आर्थराइटिस, डिजनरेटिव डिस्क डिजीज, रूमेटिज्म, होस्ट प्रोसेस, बर्सिटिस, सिनोविटिस, हाइब्रोमा-जोड़ों की इन नौ मुख्य बीमारियों के अंदर ही दूसरी बीमारियां भी आती हैं। जैसे- कॉक्स आर्थ्रोसिस एक तरह की ओस्टियो आर्थराइटिस ही है। ये तमाम बीमारियां बहुत आसानी से ठीक हो जाती हैं और इसके लिए सिर्फ जोड़ों की सफाई करनी होती है। यह पूरी तरह सुरक्षित है, इसमें लंबे मेडिकल इलाज की जरूरत नहीं पड़ती और इसे घर पर ही किया जा सकता है।

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