स्मृति शेष: मुलायम सिंह यादव

रुहेलखंड के कद्दावर सपा नेता रहे वीरपाल सिंह यादव हुए भावुक, बोले-दलितों, पिछड़ों, वंचितों, अल्पसंख्यकों के मसीहा और हम सबके अभिभावक थे ‘नेताजी’, अनाथ बनाकर चले गए

सत्य पथिक वेबपोर्टल/बरेली/Memory: कुश्ती से लेकर सियासत के मैदान तक अपने ‘धोबीपछाड़’ दांव से बड़े-बड़े सूरमाओं को चित कर देने वाला समाजवादी पहलवान आज आखिरकार ज़िंदगी की जंग हार गया। ’70 के दशक मे कांग्रेस के एकछत्र राज के वक्त समाजवादी पुरोधा डाॅ. राममनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित होकर सियासत के मैदान में कदम रखने बाले मुलायम सिंह को यूं ही नेताजी और धरतीपुत्र जैसी उपमाओं से नहीं नवाजा गया बल्कि उन्होंने इसके लिए गरीबों, पिछडो़॔ और शोषितों के हक में दशकों तक आवाज़ बुलंद रखने और सड़कों पर उतरकर लगातार धरतीपकड़ संघर्ष जारी रखने के बाद यह ऊंचा मुकाम और रुतबा हासिल किया था।  देश, प्रदेश की सियासी नब्ज पकड़कर उसकी दशा और दिशा सुधारने की ठोस कोशिशों के बलबूते भारतीय सियासत में उन्हें इन विशेषणों से नवाजा गया था।

वैसे तो यूपी जैसे राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रहने एवं देश के रक्षा मंत्री जैसे ओहदे को संभालने वाले मुलायम सिंह का प्रदेश और देश के कई शहरों और गांवों से भावपूर्ण रिश्ता और लगाव रहा लेकिन बरेली से उन्का नाता और रिश्ता ताउम्र बेहद आत्मीय रहा। बरेली में अपने वफादार पूर्व जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव को फर्श से अर्श तक पहुंचाने वाले खुद नेताजी ही थे। ‘नेताजी’ ने वीरपाल को तीन दशकों से अधिक समय तक समाजवादी पार्टी बरेली जिलाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाए रखने के अलावा उन्हें राज्यसभा का सदस्य भी बनवाया। यह ‘नेताजी’ की बरेली पर खास मेहरबानी ही थी कि पूरे यूपी के जिलाध्यक्षों मे बरेली के तत्कालीन जिलाध्यक्ष वीरपाल यादव का एक अलग रुतबा और रसूख हुआ करता था। इसके अलावा भी ‘नेताजी’ ने बरेली से अपने रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने के क्रम मे यहां के नेताओं और लोगों से बेहद ही भावुक रिश्ते बनाये।

पूर्व जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव फोन पर बातचीत मे रूंधे गले से बताते हैं कि भारत की सियासत में गरीबों,पिछड़ों, दलितों और शोषितों के हक में लगातार उठाने वाली अज़ीम शख्सियत का नाम है मुलायम सिंह यादव। वीरपाल अपने और मुलायम सिंह के रिश्ते के बारे में बताते हुए कहते हैं कि यह नेताजी की विशेष अनुकंपा और प्रेम ही था, जो वे राज्ससभा तक पहुंचे।

तीन दशकों तक रुहेलखंड की सियासत में अपना रुतबा और रसूख कायम रखने वाले वीरपाल यादव ने फोन पर बेहद गमगीन होते हुए मुलायम सिंह के निधन को भारतीय सियासत के लिए एक अपूर्णनीय क्षति बताया। वीरपाल ने नेताजी के दुनिया को अलविदा कहने पर खुद के अनाथ हो जाने की बात भी कही। पूर्व राज्यसभा सदस्य वीरपाल यादव ने फोन पर बातचीत में ‘नेताजी’ से जुड़े कई रोचक किस्से भी साझा किये। बताया, नेताजी बरेली में अपनी पहली सभा के दौरान 500 लोगों के जुटने से लेकर वर्ष 2016 की आखिरी सभा में उमड़ी लाखों की भीड़ के भी गवाह रहे।

वीरपाल यादव के अलावा वरिष्ठ सपा नेता और पीसीएस आयोग के पूर्व सदस्य प्रोफेसर ज़ाहिद खां मुलायम सिंह की इन्हीं खासियतों के बारे मे भरे मन से बताते हैं कि नेताजी वफादारों को हमेशा इज्जत देते थे। अगर मुलायम सिंह के प्रति किसी ने अपनी वफादारी दिखाई तो फिर वो शख्स उनका खास बन जाता था। सियासत में वफादारी का सिला देने वाले विरले नेताओं मे मुलायम सिंह यादव की गिनती होती है।प्रोफेसर ज़ाहिद खां भी बरेली मे मुलायम सिंह यादव के विश्वस्त और वफादार नेताओं मे शुमार किये जाते हैं।

1992 में सपा की स्थापना के समय मुलायम सिंह ने उन्हें बरेली का महानगर अध्यक्ष बनाया था। बाद में उनकी वफादारी और समर्पण को देखते हुए अपने आखिरी मुख्यमंत्रित्व काल मे पीसीएस आयोग का सदस्य भी बनाकर भेजा। प्रोफेसर ज़ाहिद खां फोन पर बातचीत में बताते हैं कि नेताजी समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए किसी मसीहा से कम नहीं थे। वो बताते हैं कि अगर कोई नेताजी की नज़रों मे चढ़ गया तो नेताजी उसे उसका सिला ज़रूर देते थे। प्रोफेसर ज़ाहिद इसका सबसे बड़ा उदाहरण खुद को मानते हुए बताते हैं कि उन्हें नेताजी ने जिस मुकाम पर पहुंचाया, अगर मुलायम सिंह की जगह कोई और होता,तो शायद यह मुमकिन नहीं था।

Report by अल्तमश सिद्दीकी

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