सत्य पथिक वेबपोर्टल/नई दिल्ली-लखनऊ/Politics: बीते मंगलवार को पूर्व मुख्यमंत्री-सपा मुखिया अखिलेश यादव ने उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को 100 विधायक लेकर आने पर सपा सरकार में मुख्यमंत्री बनाने का खुला ऑफर दिया तो डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भी पलटवार करते हुए अखिलेश को सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त और समाजवादी पार्टी को परिवारवादी पार्टी बताने में देर नहीं की। लेकिन, यह बयान देकर सपा सुप्रीमो ने मनोवैज्ञानिक खेल खेला है।

सपा सुप्रीमो अखिलेश ने मंगलवार को एक न्यूज चैनल को इंटरव्यू देते वक्त कहा, ‘केशव प्रसाद मौर्य बहुत कमजोर आदमी हैं। उन्होंने सपना तो देखा था मुख्यमंत्री बनने का लेकिन हिम्मत नहीं दिखा पाए। एक बार तो वो बता रहे थे कि उनके पास 100 से ज्यादा विधायक हैं। आज भी ले आएं 100 विधायक। अरे बिहार से उदाहरण लें न वो। जो बिहार में हुआ वो यूपी में क्यों नहीं करते हैं? अगर उनमें हिम्मत हैं और उनके साथ अगर 100 विधायक हैं तो आज भी सारे विधायक लेकर आ जाएं, समाजवादी पार्टी समर्थन कर देगी उनका।’ 
 

डिप्टी सीएम केशव का पलटवार-100 सपा विधायक हमारे संपर्क में 
अखिलेश यादव का बयान आते ही भाजपा नेताओं के भी बयान आने लगे। खुद केशव प्रसाद मौर्य ने पलटवार करते हुए कहा, ‘अखिलेश यादव मुझसे घृणा करते हैं। विधानसभा में अखिलेश का मेरे प्रति प्यार सबने देखा है। अखिलेश यादव खुद डूबने वाले हैं वो मुझे क्या मुख्यमंत्री बनाएंगे?’  बोले- ‘अखिलेश की मानसिकता सामंतवादी है। समाजवादी पार्टी एक परिवार की पार्टी बनकर रह गई है। उनके दावे में कोई दम नहीं है। भाजपा अपने आप में मजबूत पार्टी है। उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं है। हमारे गठबंधन के सभी साथी हमारे साथ हैं। उनके साथ मिलकर हम सरकार चला रहे हैं। वे (अखिलेश यादव) अपने 100 विधायक बचाएं। वो सब भाजपा में आने को तैयार हैं।’ 
 

यूपी के सियासी गलियारों सपा सुप्रीमो का यह बयान चर्चा में है। राजनीति की नब्ज को समझने वाले विश्लेषक भी मानते हैं कि अखिलेश का बयान सच्चाई से कोसों दूर है। उन्होंने तो अंधेरे में तीर छोड़ा है। लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का। अखिलेश अपने इस बयान से सत्तारूढ़ भाजपा के अंदर उथल-पुथल लाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें यह भी मालूम है कि भाजपा के 100 विधायक फिलहाल टूटना बहुत मुश्किल है, लेकिन फिर भी उन्होंने यह बयान देकर एक तरह से मनोवैज्ञानिक खेल खेलने की कोशिश की है।’

जानकार बताते हैं कि अगर 100 विधायक भाजपा से टूट भी जाते हैं तो क्या होगा? ‘403 विधानसभा सीटों वाले यूपी में अभी भाजपा की अगुआई वाली एनडीए के पास 272 विधायकों का समर्थन है। इसमें अकेले भाजपा के 254 सदस्य हैं। इसके अलावा अपना दल (एस) के 12 और निषाद पार्टी के छह सदस्यों का समर्थन मिला हुआ है। वहीं, समाजवादी पार्टी की अगुआई वाले विपक्ष के पास 119 विधायकों का समर्थन है। इसमें समाजवादी पार्टी के 111 और आरएलडी के आठ विधायक शामिल हैं। सपा गठबंधन से हाल ही में छह विधायकों वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) अलग हो चुकी है।

अगर भाजपा से 100 विधायक अलग हो जाएं तो सपा गठबंधन के कुल सदस्यों का आंकड़ा 219 तक पहुंच जाएगा जो बहुमत के आंकड़े 202 से 17 ज्यादा है। वहीं, भाजपा की अगुआई वाली एनडीए के पास 172 विधायक बचेंगे। मतलब ऐसी स्थिति में अखिलेश यादव के बहुमत से अधिक विधायक होंगे और वह सरकार बनाने की स्थिति में आ जाएंगे।

हालांकि, फिर भी सपा गठबंधन सरकार नहीं बना पाएगा। वजह यह कि भाजपा से टूटने वाले 100 विधायकों पर दल बदल कानून के अनुसार कार्रवाई होगी। मतलब इनकी सदस्यता जा सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी भी पार्टी के दो तिहाई विधायक से कम अगर टूटते हैं तो उनपर इस कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है। भाजपा के पास अभी 254 विधायक हैं। ऐसे में दल बदल कानून से बचने के लिए भाजपा के 100 नहीं, बल्कि करीब 170 विधायकों को पाला बदलना होगा। मतलब साफ है कि 100 विधायक अगर भाजपा से टूटते हैं तो भी सरकार बदलना संभव नहीं है। 
अगर पाला बदलने वाले भाजपा के 100 विधायक इस्तीफा भी दे देते हैं तब भी समीकरण भाजपा के ही पक्ष में रहेगा।

दरअसल, इस स्थिति में सदन में कुल विधायकों की संख्या घटकर 303 हो जाएगी। ऐसे में बहुमत का आंकड़ा भी घटकर 152 कर रह जाएगा। 100 विधायकों के इस्तीफे के बाद भी भाजपा के 154 विधायक रहेंगे जो बहुमत के आंकड़े से ज्यादा हैं। इसके साथ ही भाजपा के पास अपना दल और निषाद पार्टी के विधायकों का भी समर्थन है।

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