गणेश ‘पथिक’/वरिष्ठ पत्रकार

सत्य पथिक वेबपोर्टल/बरेली/Ancient Gandhi Udyan in danger: ब्रिटिश हूक़ूमत में आबाद बरेली के शहरियों को गर्मियों में घनी-ठंडी छांव और सुकून के कुछ पल देने वाले प्रसिद्ध गांधी उद्यान (Company Garden) का स्मार्ट सिटी परियोजना में अब एक तरह से अस्तित्व ही मिटाकर धनकमाऊ entertainment park और भूलभुलैया में तब्दील किया जा रहा है।

गांधी उद्यान के पुराने तालाब के सौंदर्यीकरण के नाम पर बनाया जा रहा कंक्रीट का ढांचा

यहां नए पार्क में चिकनी-रपटीली सड़कें, बच्चों और बड़ों के मनोरंजन के आधुनिक साधन, चाट-दोसा, बर्गर, पिज्जा, आइसक्रीम के स्टाल्स और टिकट खरीदकर अमीरों के चोंचलों को बढ़ावा देने वाली भूलभुलइया जैसे आइटम्स तो जरूर होंगे लेकिन बारहों महीने ठंडे-साफ पानी से लबालब रहने वाले बड़े से तालाब की जगह छोटा स्वीमिंग पूल जैसा कुछ रहेगा।

गांधी उद्यान का स्वरूप बदलने का विरोध जताते बरेली शहर के पर्यावरण प्रेमी

उंगलियों पर गिने जाने लायक बचे शहर के पर्यावरण प्रेमी आजकल बेहद चिंतित हैं। उनकी चिंता की वजह है कि आम और लीची के सैकड़ों ऊंचे फल-छायादार अंग्रेजों के जमाने के इस गांधी उद्यान या कंपनी बाग में अब लीची के कुछ पेड़ ही रह गए हैं। आम के तमाम फलदार-छायादार ‘अवध्य’ पेड़ों पर प्रशासन की बिल्कुल नाक के नीचे आरी चल चुकी है। ऊंचे-घने पेड़ों से ढंका रहने वाला गांधी उद्यान अब पेड़ों से तकरीबन खाली हो गया है। तालाब का अस्तित्व अलग से मिटाकर स्वीमिंग पूल जैसी नई शक्ल में बदला जा रहा है। पर्यावरण प्रेमियों की चिंता इसलिए और भी बढ़ गई  है क्योंकि स्मार्ट सिटी के नाम पर पब्लिक की जेब की सैकड़ों करोड़ों की गाढ़ी कमाई फूंककर प्राण वायु ऑक्सीजन के अक्षय स्रोत पेड़ों का वजूद ही शहर से अभियान चलाकर मिटाया जा रहा है।

प्रमुख पर्यावरण प्रेमी और सामाजिक जनजागरण संस्था जागर के सचिव डाॅ.  प्रदीप कुमार अपना दर्द बयां करते हुए बताते हैं कि आरटीआई डालने और मुख्यमंत्री के ऑनलाइन जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज करवाने पर भी गांधी उद्यान से पेड़ों को कटवाने और पुराने-गहरे, ठंडे-साफ पानी वाले तालाब के योजनाबद्ध ढंग से मिटाए जा रहे वजूद को बचाने की तो शासन-प्रशासन के जिम्मेदारों और जन प्रतिनिधियों द्वारा कोई पहल की नहीं गई, उल्टे नगर निगम बरेली के आयुक्त और तत्कालीन जिलाधिकारी तक ने शिकायत को इस टिप्पणी के साथ अंतिम रूप से निस्तारित दर्शा दिया कि तालाब का अस्तित्व मिटाया नहीं जा रहा है, बल्कि उसका सौंदर्यीकरण कराया जा रहा है।

शिकायतकर्ता डाॅ. प्रदीप कुमार ने बारहों महीने पानी से लबालब भरे रहने वाले गांधी उद्यान के बड़े से तालाब को सौंदर्यीकरण के नाम पर छोटे से कंक्रीट के ढांचे में बदले जाने पर घोर आपत्ति जताई थी। साथ ही शिकायत निस्तारण पर पूरी तरह असहमति और असंतुष्टि जताते हुए चिट्ठी लिखी और व्यक्तिगत रूप से भी अफसरों-नेताओं से संपर्क कर हजारों पखेरुओं की जान बचाने वाले पानी के इस प्राकृतिक स्रोत को बचाने की बहुतेरी मिन्नतें कीं। पेड़ बचाने को धरना-प्रदर्शन तक किए लेकिन सब कुछ बेअसर ही रहा है।

डाॅ. प्रदीप कहते हैं-दो साल से चल रहे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में पुलों, सड़कों के निर्माण-चौड़ीकरण की वजह से बरेली शहर से हरियाली तेजी से मिटाई जा रही है। मिनी बाईपास पर निर्माणाधीन रोडवेज बस अड्डे के नाम पर तमाम हरे-भरे पेड़ों की असमय ही निर्मम हत्याओं के खिलाफ आंदोलन छेड़ चुके डाॅ. प्रदीप के दावे पर यकीन करें तो अपने बरेली शहर में मुश्किल से 0.2% ही हरियाली बची है। हरियाली के दुश्मनों की गिद्ध दृष्टि अब उस बची-खुची हरियाली पर भी गड़ी है।

बहरहाल, हरियाली के इन दुश्मनों ने गांधी उद्यान को पेड़ों को कटवा-कटवाकर इतना खोखला कर दिया है कि अब यहां ठंडक के बजाय गर्माहट ही महसूस होती है। पहले यहां इतने ज्यादा पेड़ थे कि दिन में भी अंधेरा रहता था। यहां आने वाले लोग आम, लीची छककर खाते थे फिर भी उद्यान से फल खत्म नहीं होते थे। 

चर्चित कवि एवं पर्यावरण-जीव प्रेमी डाॅ. राहुल अवस्थी संवेदनाशून्य होते जा रहे सिस्टम को टार्गेट पर लेते हुए कहते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर में प्राणवायु आक्सीजन की भारी कमी से एक-एक सांस के लिए जूझते और दम तोड़ते सैकड़ों रोगियों को देखकर भी हुक्मरान और नौकरशाह ऑक्सीजन के अक्षय स्रोत पेड़ों का धड़ाधड़ कटान कराकर लाखों-करोड़ों रुपये फूंककर कृत्रिम ऑक्सीजन प्लांट लगवाने पर तुले हैं। बोले-दुनिया भर में जहां भी हाईवे बन रहे हैं उनमें पेड़ लगाने लायक चौड़े डिवाइडर बनाए जा रहे हैं, रोड की दोनों साइडों की खाली जगह का भी हरित पट्टियां विकसित कराई जा रही हैं लेकिन बरेली में इसका ध्यान ही नहीं रखा गया है। सर्वेयर इतने घटिया दर्जे के हैं कि टेलीफोन-बिजली के खंभे तो हटवा नहीं पाए लेकिन सड़क चौड़ीकरण, ओवरब्रिज आदि के निर्माण के नाम पर घनी छायादार पाकड़ों समेत सैकड़ों पेड़ों को धराशायी जरूर करवा दिया है।

उद्यान की दुर्दशा से परेशान लोग जनप्रतिनिधियों से आस लगाए हैं कि वे इस उद्यान को बचाने के लिए आगे जरूर आएंगे। 20 वर्षों से रोजाना यहां आ रहे योग कमेटी के रमेश अग्रवाल बताते हैं कि फहले यहां इतने पेड़ थे कि लोगों को धूप नहीं लगती थी। आम, लीची, जामुन, बड़हल के पेड़ तो सैकड़ों थे। अचानक बारिश में कहीं ठहरने की सुविधा नहीं थी, तब तत्कालीन मेयर डा. आईएस तोमर ने यहां शेड बनवाया था लेकिन अब पेड़ ही नहीं रह गए हैं।

हरी भरी कमेटी के सदस्य अनिल वर्मा बताते हैं कि उद्यान का निजीकरण गंभीर समस्या है। यह नहीं होना चाहिए। प्रयागराज के एक पार्क के व्यावसायिक उपयोग पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थीशलेकिन गांधी उद्यान में भूलभुलैया बनाई जा रही। उसे निजी हाथों में सौंपा गया है। अब उद्यान में सुबह नौ बजे के बाद गर्मी लगने लगती है, जबकि पहले यहां पेड़ों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि लोगों को गर्मी महसूस नहीं होती थी।

मो. आलमगीर बताते हैं कि गांधी उद्यान में कई सबमर्सिबल पंप थे, जिनसे पेड़-पौधों में पानी लगता था लेकिन अब ये चलते ही नहीं हैं। उद्यान की देखभाल करने वाले कर्मचारियों को हटा दिया गया है। जगह’जगह पक्के निर्माण हो गए हैं। भूलभुलैया बना दी गई है। इसकी जरूरत नहीं थी। जिम्मेदारों ने यहां के उद्यान को खत्म कर दिया है। प्राकृतिक संरचनाएं नष्ट करके कंक्रीट निर्माण को तरजीह दी जा रही है।

हरी भरी कमेटी के सदस्य दाउद खां बताते हैं कि उद्यान में वालीबाल कोर्ट था। उसे भी उजाड़ दिया है। डस्टबिन खत्म हो रहे हैं। शौचालय प्रयोग करने के लिए पैसे मांगे जाने लगे हैं। उद्यान को लीज पर देने का काम शुरू कर दिया गया है। कुछ दिनों में उद्यान में टहलने के लिए टिकट भी लगने लगेगा। उद्यान को बचाने के लिए जनप्रतिनिधियों को आगे आना होगा।

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